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बस्तर की धरती पर जनसैलाब: जल, जंगल, जमीन बचाने हजारों आदिवासियों की ऐतिहासिक हुंकार, दंतेवाड़ा कलेक्ट्रेट का घेराव

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5 दिन की पदयात्रा के बाद उमड़ा जनसैलाब, वन और खनिज संसाधनों की लूट के खिलाफ बुलंद हुई आवाज

दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़।
बस्तर के जल, जंगल और जमीन को बचाने तथा वन एवं खनिज संसाधनों की कथित खुली लूट के विरोध में गुरुवार को दंतेवाड़ा की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। पूर्व विधायक मनीष कुंजाम के नेतृत्व में निकाली गई 5 दिवसीय पदयात्रा के समापन पर हजारों की संख्या में आदिवासी, मूलनिवासी, किसान, मजदूर, महिलाएं और युवा दंतेवाड़ा पहुंचे और कलेक्ट्रेट का घेराव कर जोरदार प्रदर्शन किया।
पदयात्रा के दौरान बस्तर के विभिन्न गांवों और क्षेत्रों से गुजरते हुए आंदोलनकारियों ने लोगों को प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा, संवैधानिक अधिकारों और आदिवासी स्वशासन के प्रति जागरूक किया। यात्रा के अंतिम दिन दंतेवाड़ा में विशाल रैली निकाली गई, जिसमें हजारों लोग हाथों में बैनर और झंडे लेकर शामिल हुए।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि बस्तर की बहुमूल्य खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन लगातार बढ़ रहा है, जबकि स्थानीय आदिवासी समुदायों के अधिकारों और हितों की अनदेखी की जा रही है। उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान, संस्कृति और अस्तित्व का आधार हैं।
आदिवासी मूलनिवासी संगठन के प्रदेश अध्यक्ष अमरजीत पटेल ने कहा कि बस्तर के जंगल, पहाड़, नदियां और प्राकृतिक संपदा यहां के मूल निवासियों की धरोहर हैं। यदि इनके संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा नहीं की गई तो आंदोलन और अधिक व्यापक तथा उग्र रूप धारण करेगा। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपनी जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखेगा।
कलेक्ट्रेट परिसर के सामने आयोजित सभा में वक्ताओं ने सरकार से आदिवासियों के पारंपरिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने, ग्राम सभाओं की सहमति के बिना किसी भी परियोजना को लागू न करने तथा प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की। इसके बाद आंदोलनकारियों ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा।
पूरे प्रदर्शन के दौरान “जल, जंगल, जमीन बचाओ”, “बस्तर बचाओ”, “आदिवासी अधिकारों की रक्षा करो” और “प्राकृतिक संसाधनों की लूट बंद करो” जैसे नारों से दंतेवाड़ा गूंजता रहा। बड़ी संख्या में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी ने आंदोलन को और अधिक मजबूत स्वरूप प्रदान किया।

मुख्य मांगें

जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा।
वन एवं खनिज संसाधनों के दोहन पर स्थानीय समुदायों की सहमति सुनिश्चित की जाए।
ग्राम सभाओं के अधिकारों का पूर्ण सम्मान किया जाए।
प्राकृतिक संसाधनों की कथित लूट पर रोक लगाई जाए।
आदिवासी हितों और संवैधानिक प्रावधानों का पालन सुनिश्चित किया जाए।

बस्तर बिकने नहीं देंगे, जल-जंगल-जमीन छिनने नहीं देंगे!”

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