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सरकारी स्कूलों में मंत्र पाठ अनिवार्य: शिक्षा का मंदिर या धार्मिक प्रयोगशाला?

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आजाद हिंद लाइव 24 | रायपुर
सवाल शिक्षा का, जवाब भविष्य का
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा नए शिक्षा सत्र 2026-27 से शासकीय विद्यालयों में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, भोजन मंत्र, गायत्री मंत्र एवं शांति मंत्र के नियमित पाठ को अनिवार्य किए जाने के बाद प्रदेश में नई बहस छिड़ गई है।
सरकार का दावा है कि इन गतिविधियों से विद्यार्थियों का बौद्धिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक विकास होगा तथा वे भारतीय परंपराओं और संस्कारों से परिचित होंगे। वहीं दूसरी ओर कई सामाजिक संगठनों, शिक्षाविदों और नागरिकों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं।
आलोचकों का कहना है कि सरकारी विद्यालयों का मूल उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किक सोच का विकास होना चाहिए। उनका तर्क है कि जब प्रदेश के अनेक सरकारी स्कूल बुनियादी सुविधाओं, शिक्षकों की कमी और कमजोर शैक्षणिक स्तर जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब सरकार को शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
विरोध करने वाले पक्ष का कहना है कि यदि संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए ऐसे कार्यक्रम आवश्यक हैं तो इच्छुक विद्यार्थियों के लिए अलग व्यवस्था की जा सकती है, लेकिन सभी छात्रों के लिए धार्मिक स्वरूप वाले मंत्रों को अनिवार्य करना उचित नहीं माना जा सकता।
वहीं सरकार का पक्ष है कि इन गतिविधियों का उद्देश्य किसी धर्म विशेष का प्रचार नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में अनुशासन, नैतिक मूल्यों, राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक चेतना का विकास करना है।
इस आदेश के बाद शिक्षा के स्वरूप, वैज्ञानिक सोच, संवैधानिक मूल्यों और सांस्कृतिक परंपराओं को लेकर प्रदेश में बहस तेज हो गई है। अब देखना यह होगा कि यह पहल विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का माध्यम बनती है या फिर विवाद का विषय बनी रहती है।

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