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जीरो टॉलरेंस” के दावों के बीच मनरेगा में बड़ा खेल? बैकुंठपुर जनपद से जिला पंचायत तक सत्ता का दबदबा, फिर भी भ्रष्टाचार के आरोपों से गरमाया कोरिया जिला

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बैकुंठपुर / कोरिया।
छत्तीसगढ़ सरकार लगातार भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेंस” और सुशासन की नीति का दावा कर रही है, लेकिन जिला कोरिया के बैकुंठपुर जनपद पंचायत अंतर्गत सामने आए मनरेगा अनियमितताओं के आरोपों ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब बैकुंठपुर जनपद पंचायत से लेकर जिला पंचायत तक सत्ता पक्ष का प्रभाव और प्रशासनिक पकड़ मजबूत मानी जाती है, तब भी मनरेगा विभाग में खुलेआम कथित भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े के आरोप आखिर कैसे सामने आ रहे हैं?
ग्रामीणों द्वारा 26 मई 2026 को कलेक्टर कोरिया को सौंपे गए शिकायत पत्र में फर्जी हाजरी, मशीनों से कार्य, मजदूरों के हक में कटौती, परिवार के लोगों के नाम पर भुगतान और यहां तक कि 12 वर्षीय नाबालिग बच्ची के नाम हाजरी भरने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
मौके पर 60 मजदूर, रजिस्टर में 100 की हाजरी!
ग्रामीणों का आरोप है कि बसबहरी तालाब गहरीकरण कार्य में प्रतिदिन लगभग 60 मजदूर ही दिखाई देते हैं, लेकिन रोजगार रजिस्टर में करीब 100 मजदूरों की उपस्थिति दर्ज की जा रही है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि फर्जी नाम जोड़कर सरकारी राशि का आहरण किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच हो जाए तो करोड़ों की योजनाओं में बड़े स्तर पर अनियमितताओं का खुलासा हो सकता है।
12 साल की बच्ची के नाम हाजरी से मचा हड़कंप
मामले में सबसे चौंकाने वाला आरोप एक 12 वर्षीय नाबालिग बच्ची के नाम मजदूरी भुगतान का है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार बच्ची मजदूरी करने नहीं जाती, फिर भी उसके नाम से नियमित हाजरी भरी जा रही है।
यदि यह आरोप सही साबित होता है, तो यह केवल विभागीय गड़बड़ी नहीं बल्कि बाल श्रम, सरकारी रिकॉर्ड में फर्जीवाड़ा और भ्रष्टाचार का गंभीर मामला बन सकता है।
जेसीबी से काम, मजदूरों के हक पर चोट
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि मनरेगा योजना का उद्देश्य ग्रामीण मजदूरों को रोजगार देना है, लेकिन कई कार्य मशीनों और जेसीबी से कराए जा रहे हैं। इससे वास्तविक मजदूरों को रोजगार नहीं मिल पा रहा और सरकारी योजना का उद्देश्य प्रभावित हो रहा है।
सबसे बड़ा सवाल — आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है यह भ्रष्टाचार?
यदि मनरेगा में फर्जी हाजरी, नाबालिग बच्ची के नाम भुगतान और सरकारी राशि के दुरुपयोग जैसे आरोप प्रशासनिक लापरवाही से हो रहे हैं, तो फिर सत्ता और शासन अब तक मौन क्यों हैं?
और यदि यह पूरा खेल सत्ता के संरक्षण में चल रहा है, तो विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सड़क से सदन तक आवाज क्यों नहीं उठा रहा?
जनता के बीच अब यह चर्चा तेज हो गई है कि —
क्या जिम्मेदार अधिकारियों को संरक्षण प्राप्त है?
क्या “जीरो टॉलरेंस” सिर्फ मंचों तक सीमित नारा बनकर रह गया है?
क्या गरीब मजदूरों के हक पर डाका डालने वालों पर होगी कार्रवाई?
आखिर इस पूरे भ्रष्टाचार का असली जिम्मेदार कौन है?
“सुशासन” बनाम जमीनी सच्चाई
प्रदेश सरकार मंचों से पारदर्शिता और सख्त कार्रवाई की बात करती है, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि जमीनी स्तर पर अधिकारी-कर्मचारी नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं।
यदि समय रहते निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो शासन की भ्रष्टाचार विरोधी नीति और “सुशासन” के दावों पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
कलेक्टर से कठोर कार्रवाई की मांग
ग्रामीणों ने कलेक्टर कोरिया से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, हाजरी रजिस्टर और भुगतान रिकॉर्ड की बारीकी से जांच हो तथा दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।
अब पूरे जिले की निगाहें प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

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