कोरिया में चुनावी भूचाल! मात्र 66 वोटों के अंतर पर उठे सवाल, पुनर्गणना की मांग से प्रशासनिक गलियारों में हलचल क्या 66 वोटों के अंतर में छिपा है बड़ा राज?”
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जनपद पंचायत क्षेत्र क्रमांक-07 का चुनाव परिणाम विवादों के घेरे में, प्रत्याशी लीलाधर पैकरा ने खोला मोर्च
बैकुंठपुर, कोरिया। जनपद पंचायत सदस्य उपचुनाव क्षेत्र क्रमांक-07 का चुनाव परिणाम घोषित होते ही कोरिया जिले की राजनीति में नया तूफान खड़ा हो गया है। मात्र 66 वोटों के बेहद कम अंतर से हार का सामना करने वाले प्रत्याशी लीलाधर पैकरा ने चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए संपूर्ण क्षेत्र की पुनर्गणना (Re-Counting) की मांग कर दी है।
रिटर्निंग ऑफिसर को सौंपे गए आवेदन में लीलाधर पैकरा ने दावा किया है कि मतगणना प्रक्रिया के दौरान कई ऐसे बिंदु रहे, जिनकी जानकारी प्रत्याशियों को नहीं दी गई। सबसे बड़ा सवाल रिजेक्ट (निरस्त) मतों को लेकर खड़ा हुआ है। आखिर कितने मत निरस्त हुए? किन कारणों से हुए? और उनका विस्तृत रिकॉर्ड क्या है? यह जानकारी अब तक स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं कराई गई।
लोकतंत्र में 66 वोट का अंतर या पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न?
01 जून 2026 को हुई मतगणना में विजयी प्रत्याशी शिवराम सिंह को 1217 वोट जबकि लीलाधर पैकरा को 1151 वोट मिले। दोनों के बीच का अंतर केवल 66 मतों का रहा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इतने कम अंतर वाले चुनावों में एक-एक वोट की अहमियत बढ़ जाती है और ऐसी स्थिति में पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
लीलाधर पैकरा ने अपने आवेदन में उल्लेख किया है कि क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली 09 ग्राम पंचायतों एवं अनेक पोलिंग बूथों में वे स्वयं या उनके मतगणना अभिकर्ता उपस्थित नहीं हो पाए। ऐसे में मतगणना की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए पुनर्गणना आवश्यक है।
प्रशासन के सामने खड़े हुए बड़े सवाल
रिजेक्ट मतों की संख्या क्या है?
निरस्त मत किन कारणों से हुए?
क्या सभी पोलिंग बूथों का बूथवार विवरण प्रत्याशियों को उपलब्ध कराया गया?
मतगणना अभिलेखों का सत्यापन क्यों नहीं कराया गया?
जब अंतर केवल 66 वोटों का है तो पुनर्गणना में आपत्ति क्यों?
इन सवालों ने अब प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी बहस छेड़ दी है।
दो टुक प्रशासन से मांग की प्रत्याशी लीलाधर पैकरा
✔ सभी 09 ग्राम पंचायतों के मतोंप्रत्याशी की दो टूक मांग की पुनर्गणना कराई जाए।
✔ बूथवार मतगणना का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए।
✔ रिजेक्ट मतों का विस्तृत ब्यौरा उपलब्ध कराया जाए।
✔ मतगणना एवं सारणीकरण अभिलेखों का पुनः परीक्षण कराया जाए।
✔ पुनर्गणना प्रत्याशी अथवा उनके अधिकृत प्रतिनिधि की उपस्थिति में कराई जाए।
✔ अंतिम प्रमाण पत्र जारी करने से पहले आवेदन पर निर्णय लिया जाए।
अब गेंद प्रशासन के पाले में
आवेदन जमा होने के बाद जिले के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। क्षेत्र की जनता भी अब यह जानना चाहती है कि आखिर 66 वोटों के इस अंतर पर उठे सवालों का जवाब कौन देगा?
यदि प्रशासन पुनर्गणना की अनुमति देता है तो परिणाम में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं यदि मांग खारिज होती है तो विवाद और गहरा सकता है।
Azad Hind Live24 का सवाल
“जब जीत-हार का फैसला सिर्फ 66 वोटों पर टिका हो, तब क्या लोकतंत्र की पारदर्शिता के लिए पुनर्गणना जरूरी नहीं?”
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