₹20 लाख में MBBS सीट का सौदा! ₹100 के स्टाम्प पर लिखी गई ‘मेडिकल माफिया’ की काली कहानी — इकरारनामा चीख रहा, सिस्टम अब भी मौन!
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जशपुर / महासमुंद।
छत्तीसगढ़ में मेडिकल शिक्षा अब “मेहनत” नहीं, बल्कि “मोलभाव” का खेल बनती जा रही है। प्रदेश में सामने आए एक सनसनीखेज मामले ने शिक्षा व्यवस्था, प्रशासन और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला ऐसा है, जिसमें कथित तौर पर मेडिकल कॉलेज में एडमिशन दिलाने के नाम पर ₹20 लाख नकद लेकर सौदा किया गया और पूरी डील को ₹100 के नोटरीकृत स्टाम्प पेपर पर बाकायदा लिखित रूप दे दिया गया।
यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि दस्तावेजों में दर्ज वह हकीकत है, जिसने “जीरो टॉलरेंस” और “पारदर्शी शासन” के दावों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि जब भ्रष्टाचार खुद स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर करके घूम रहा हो, तब भी प्रशासन आखिर कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा?
कैसे हुआ मेडिकल सीट का ‘ब्लैक डील’?
दस्तावेजों के अनुसार, महासमुंद जिले के सराईपाली निवासी एवं अम्बिका हॉस्पिटल संचालक भूषण नायक ने जशपुर जिले के पत्थलगांव निवासी नेतराम चौधरी की बेटी को रायपुर के एक निजी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन दिलाने का जिम्मा लिया।
इसके एवज में कथित तौर पर ₹20 लाख नकद राशि ली गई।
इकरारनामे में यह भी उल्लेख है कि छात्रा का एडमिशन पहले बालाजी मेडिकल कॉलेज, रायपुर में कराने की कोशिश हुई, लेकिन मामला सफल नहीं हुआ। बाद में छात्रा को नया रायपुर स्थित श्री रावतपुरा सरकार इंस्टीट्युट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च में प्रवेश दिलाया गया, जहां नियमानुसार लगभग ₹21 लाख की फीस अलग से जमा की गई।
यानी एक तरफ कॉलेज फीस, दूसरी तरफ “सीट फिक्सिंग” के नाम पर अलग से ₹20 लाख का सौदा!
15 मई की डेडलाइन खत्म… फिर भी कार्रवाई शून्य!
इकरारनामे में साफ लिखा गया था कि यदि तय मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं हो पाता, तो ₹20 लाख की रकम 15 मई 2026 तक वापस की जाएगी।
आज मई 2026 समाप्ति की ओर है, लेकिन न रकम वापसी की पुष्टि हुई और न ही किसी जांच एजेंसी की सक्रियता दिखाई दी।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि:
क्या पुलिस को अब भी शिकायत का इंतजार है?
क्या इतने बड़े नकद लेनदेन पर आयकर विभाग और ED की नजर नहीं गई?
मेडिकल सीटों की खरीद-फरोख्त अब “सामान्य व्यवस्था” बन चुकी है?क्या
डॉक्टर बना गवाह, सिस्टम बना तमाशबीन!
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू इकरारनामे में मौजूद गवाहों के नाम हैं। दस्तावेज पर दूसरे गवाह के रूप में “पुरुषोत्तम” नाम दर्ज है, जिन्हें सूत्र रायगढ़ के प्रतिष्ठित डॉक्टर डॉ. पुरुषोत्तम पटेल बता रहे हैं।
अब सवाल उठता है—
जिस पेशे का उद्देश्य जीवन बचाना है, उसी पेशे से जुड़े लोग यदि मेडिकल सीटों के कथित सौदों के गवाह बन जाएं, तो शिक्षा व्यवस्था का भविष्य कितना सुरक्षित है?
क्या यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला है, या फिर पूरे प्रदेश में मेडिकल एडमिशन का कोई बड़ा सिंडिकेट सक्रिय है?
प्रशासन पर उठ रहे 3 बड़े सवाल
1. IT और ED आखिर चुप क्यों हैं?
₹20 लाख नकद लेनदेन का दस्तावेज सामने आने के बाद भी कोई जांच नहीं होना कई सवाल खड़े करता है।
2. क्या कानून सिर्फ आम आदमी के लिए है?
छोटे मामलों में त्वरित कार्रवाई करने वाली एजेंसियां इतने बड़े प्रकरण में अब तक मौन क्यों हैं?
3. क्या प्रदेश में ऐसे और भी “स्टाम्प पेपर सौदे” मौजूद हैं?
अगर एक मेडिकल सीट के लिए इतना बड़ा सौदा लिखित रूप में हो सकता है, तो बाकी मामलों का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
‘जीरो टॉलरेंस’ या ‘जीरो एक्शन’?
प्रदेश सरकार लगातार भ्रष्टाचार पर सख्ती और पारदर्शी प्रशासन का दावा करती है। लेकिन इस मामले ने उन दावों की जमीन हिला दी है।
जब दस्तावेज खुद कथित सौदे की कहानी बयान कर रहे हों, तब भी यदि कार्रवाई न हो, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सिस्टम पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
अब देखना यह होगा कि—
क्या यह मामला भी बाकी घोटालों की तरह फाइलों में दब जाएगा?
या फिर पुलिस, आयकर विभाग और ED मिलकर मेडिकल सीटों के इस कथित “काले कारोबार” का पर्दाफाश करेंगे?
फिलहाल तो स्टाम्प पेपर चीख रहा है… और सिस्टम गहरी नींद में दिखाई दे रहा है।
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