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माया मिली न राम, अयोध्या ने भी ठुकराए ठगवान

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(आलेख : बादल सरोज)

उत्तर प्रदेश/ अयोध्या नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते वक़्त अपनी “विनम्र” शुरुआत सेवक के रूप में की थी। तब तो वे प्रधान सेवक का दर्जा भी लेने को तैयार नहीं थे, यह भी उन्हें उनके भक्तों ने दिया था। इसके बाद  2019 का चुनाव आते-आते वे चौकीदार हो गए और 2024 का चुनाव पूरा होने से पहले ही वे प्राणी जगत  के सारे मानकों और जैविक नियमों से ऊपर उठकर अलौकिक, अयोनिज, असाधारण, असंभव और अनंतिम अवस्था ईश्वरत्व  को प्राप्त हो गए। ऐसा नहीं है कि इससे पहले उन्हें भगवान का दर्जा नहीं दिया गया, कई बार दिया गया – मगर अब तक यह काम संबित पात्रा, कंगना राणावत, केंद्र और प्रदेशों की भाजपा सरकारों के छुटके मंत्री, भाजपा के बटुक प्रवक्ता किया करते थे – इस बार ख़ास यह है कि यह एलान मोदी जी ने स्वयं किया है।

बादल सरोज लेखक ‘ लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।

 

चुनाव अभियान के चौथे चरण के बाद अचानक से उन्होंने  प्रायोजित मीडिया साक्षात्कारों की जो झड़ी-सी लगा दी थी, जिन 80 से ज्यादा इंटरव्यूज में उन्होंने कई चौंकाने वाले, ज्यादातर हंसाने वाले रहस्योदघाटन किये थे, ऐसे ही एक इंटरव्यू में उन्होंने दावा किया कि “पहले जब तक मां जिंदा थीं, तो मुझे लगता था कि शायद बायोलॉजिकली मुझे जन्म दिया गया है। माँ के जाने  के बाद इन सारे अनुभवों को मैं जोड़ करके देखता हूं, तो मैं कन्विंस हो चुका हूँ,, गलत हो सकता हूँ, लेफ्टिस्ट लोग तो मेरी धज्जियां उड़ा ही देंगे, मेरे बाल नोंच देंगे, मगर मैं कन्विंस हो चुका हूँ कि परमात्मा ने मुझे भेजा है।“ यही बात एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में भी उन्होंने दोहराई और कहा कि “कुछ लोग मुझे पागल कह सकते हैं, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि परमात्मा ने मुझे एक उद्देश्य के लिए भेजा है। एक बार उद्देश्य पूरा हो जाए, तो मेरा काम भी पूरा हो जाएगा।” जिस भगवान द्वारा खुद को भेजा हुआ होने का रहस्योद्घाटन किया, उसके साथ अपने कम्युनिकेशन सिस्टम को भी उन्होंने स्पष्ट किया और कहा कि “मैं उनसे सीधे फोन करके यह नहीं पूछ सकता कि आगे क्या होगा। वह (ईश्वर) अपने पत्ते नहीं खोलते, बस मुझसे काम करवाते रहते हैं।” कुछ लोगों का दावा है कि उन्होंने अपने द्वारा कराये जाने वाले ईश्वरीय कामों की समयावधि 2047 तक होने की बात कही है,  हो सकता है खुद इंटरव्यूकर्ताओं – जो सभी उनके अपने ही थे – को यह कुछ ज्यादा ही ज्यादा लगी हो और उन्होंने इसे संपादित कर दिया हो। कुछ दिन तक यह दावेदारी भी खबरों, विशेषकर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय रही। बहरहाल ‘समयावधि दी कि नहीं दी’ पर चर्चा का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि वैसे भी भगवान की कोई एक्सपायरी डेट होती ही कहाँ है।

यूं तो वे जब से भारतीय राजनीति के क्षितिज पर आये हैं, तब से ही पूरी पूर्व-तैयारी के साथ “मोदी मोदी” करवाना और इन दिनों खुद ही “मोदी मोदी” करने का आत्ममुग्धता का “आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम” का भाव उनकी ख़ास पहचान रहा है। मगर इस बार इन्होंने जो फेंका, वह खुद मोदी स्टैण्डर्ड से भी कुछ ज्यादा ही दूर तक फेंका गया दावा है। इतना बेढब और विचित्र कि जिन वामपंथियों से धज्जियां उड़ने और बाल नोचे जाने, पागल समझे जाने का उन्हें डर था, उनने तो कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी, ज्यादातर तो उनके स्वास्थ्य की चिंता करते ही दिखाई दिए। मगर दिलचस्प यह था कि उनका अपना जी-हुजूरिया मीडिया तक झेंपा झेंपा सा दिखा और इन अतरंगी दावों की आलोचना में कथित शब्द जोड़कर इसकी हास्यास्पदता को ढांपने की कोशिश की । हालांकि एकाधिक बार फिर दोहराकर मोदी ने इन बेचारों की इस पर्दादारी को बेपर्दा कर दिया। कुछ लोग यह मानते हैं कि यह चरम – क्लाइमेक्स – है, अब जब ईश्वर ही बन गए, तो भला अब इससे अधिक और क्या बनेंगे। मगर यकीन मानिए ये लोग गलत साबित होने वाले हैं। यह क्लाइमेक्स का नहीं, एंटी-क्लाइमेक्स का समय है। उस पर  ये तो मोदी हैं, जिनके नवोन्मेषण की कोई सीमा नहीं है। कल को हो सकता है, वे ईश्वर होने से उकता जाएँ और स्वयं को दुनिया के सारे ईश्वरों का भी सुपर ईश्वर घोषित कर दें। मोदी है, तो मुमकिन है।

वैसे खुद के भगवान होने का दावा करने वाले वे पहले व्यक्ति नहीं है। पृथ्वी पर ऐसी कई महान विभूतियाँ हुई है, जिन्होंने खुद के ईश्वर और गॉड होने का एलान किया, कुछ अभी भी हैं। खुद भारत में भी ऐसे अनेक हुए हैं। ज़रा सी फुर्सत मिले, तो इनकी एक भरी-पूरी सूची तैयार की जा सकती है। यह अलग बात है कि इनमें से ज्यादातर “भगवान” विवादों में, आपराधिक मामलों में लिप्त पाए गए, उन पर आपराधिक प्रकरण चले, कुछेक तो अभी भी अलग-अलग जेलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। सत्ता की राजनीति में भी ऐसे-ऐसों की भरमार रही है, जिनके बारे में दक्षिण एशिया के महान शायरों में से एक हबीब जालिब साहब ने दर्ज भी किया कि “तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था / उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था!!” हालांकि जालिब साहब यह बात व्यंजना में कह रहे थे, यह तो उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि उनका उपालम्भ एक दिन उन्हीं के पड़ोस में संज्ञा के रूप में सशरीर हाजिर नाजिर हो जाएगा।

कुछ के लिए मजेदार तो कुछ के लिए गैर जिम्मेदार  बात यह है कि ऐसा दावा करते हुए मोदी ने स्वयं उस सनातन धर्म की धारणाओं को भी ताक पर रख दिया, जिसकी रक्षा, सुरक्षा और बहाली के लिए वे स्वयं को ईश्वर द्वारा भेजा बता रहे थे। अपने दावे से उन्होंने सनातन को भी सेमेटिक धर्म में बदल दिया है। ईश्वर द्वारा भेजे जाने की समझदारी अब्राहमिक  धर्मों की है, जहां समय-समय पर खुदा अपने दूत पैगम्बरों के रूप में, कभी अब्राहम, कभी ईसा, तो कभी हजरत मोहम्मद का नाम। सनातन धर्म का भगवान किसी को नहीं भेजता, वह “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌॥” मतलब यह कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही वह अपने रूप को रचता है और  साकार रूप से लोगों के सम्मुख खुद प्रकट होता है। किसी को भेजता-पठाता नहीं है, अवतार लेकर स्वयं आता है। 

जिस सनातन को मोदी मानते हैं और जिस ऋग्वेद को उसका प्राचीनतम ग्रन्थ कहते हैं, उसके जितने भी वरिष्ठ भगवान हैं, वे अब आवागमन नहीं करते। उनमें से उस जमाने में जो पाँचवें नम्बर पर आते थे, उन विष्णु पर ही बार-बार अवतरित होने की जिम्मेदारी आन पड़ी है। वैसे दावा तो उनके 24 अवतारों का है, जिनमें से 23 हो चुके हैं, किन्तु भगवद्गीता में सिर्फ 10 बार अवतरित होने का प्रावधान है। इनमें से अभी तक 9 बार वे मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण और बुद्ध के रूप में आ चुके हैं, शेष सिर्फ एक आख़िरी कल्कि अवतार बचा है। इस लिहाज से यदि मोदी कल्कि होने का दावा करते, तो कहीं अधिक धर्मसम्मत और सनातनी लगते, मगर उन्होंने तो धार्मिकता की पूरी समझ को ही जम्बूद्वीपे भारतखंडे से उठाकर यरुशेलम पहुंचा दिया। खैर, जब सनातनियों को ही कोई उज्र नहीं है, वे इसमें खुश हैं, तो हमें “तू कौन मैं खामखाँ” बनने की क्या पड़ी है!

हमें जो पड़ी है, वह यह कि ये स्वांग, प्रहसन या कौतुकी मनोरंजन नहीं है। यह 57 से अधिक रैलियों, 80 से अधिक इंटरव्यूज से आयी थकान का परिणाम नहीं है, यह जनता के रोष के ज्वार को देखकर अकबकाना, पांवों तले से रेत निकलती देख विश्वास का डगमगाना भी नहीं है। यह जिस दिखावे और इवेंट मैनेजमेंट में मोदी और उनके हिन्दुत्वी कार्पोरेटिये दक्ष हैं, उसका नया संस्करण दिखाना भी नहीं है। यह सोचे-समझे तरीके से राजनीतिक-सामाजिक विमर्श में धर्म – सैकड़ों धर्मों, हजारों पंथों, धारणाओं और पूजापाठ आराधना प्रणालियों वाले देश में एक ही धर्म — की वर्तनी को प्रामाणिक और मानक वर्तनी बनाने की साजिश है। यह आस्तिक हिन्दू समुदाय के धार्मिक विश्वासों का दोहन कर इस बहाने उनके वोटों के दूध से अपनी बाल्टी लबालब भरने की कोशिश है। यह ऐसा अकारथ है, जिसका भारत के संविधान में साफ़-साफ़ निषेध किया गया है। यह धर्म का शुद्ध राजनीतिक प्रयोजन से किया गया ऐसा अपवित्र इस्तेमाल है, जो राजनीति और धर्म दोनों को विषाक्त बनाता है। यह मोदी की पार्टी भाजपा के निदेशक, नियंत्रक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अपनी तरह का हिन्दू पद्पादशाही वाला भारत बनाने का नक्शा है ; एक ऐसा भारत, जो भारत के 5-7 हजार के इतिहास में आज तक कभी अस्तित्व में नहीं रहा।  

त्रासदी यह है कि इस काम को नयी निम्नतम नीचाई तक ले जाने वाले इस अभियान के समापन में मोदी ने भारतीय इतिहास के ऐसे दो महान व्यक्तित्वों – गांधी और विवेकानंद —  से जोड़कर किया है, और उनके बहाने अपने अपवित्र इरादों को प्रतिष्ठा देने की कोशिश की है, जो इस धतकरम के विरूद्ध ऐसे बड़े योद्धा हैं, जिनकी धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता असंदिग्ध और प्रश्नों से परे हैं ।

जिन गांधी की दुनिया भर में पहचान कराने का श्रेय एक फिल्म को देते हुए एक इंटरव्यू में मोदी अफ़सोस जता रहे थे और इस तरह अब उनके व्यक्तित्व को दुनिया जहान में ले जाने का बीड़ा सा उठा रहे थे, वे गांधी जीवन भर पक्के सनातनी हिन्दू रहे। इसी कुनबे के गोडसे की गोलियां खाने के बाद भी “हे राम!” बोलकर गए, मगर  अत्यंत धार्मिक होने  के बावजूद धर्म के नाम पर राजनीति करने और धर्म के आधार पर राष्ट्र बनाने के खिलाफ रहे। उन्होंने बार-बार कहा कि “यदि किसी देश में सारे के सारे नागरिक भी एक ही धर्म को मानने वाले हों, तब भी धर्म के आधार पर राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता।” उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि “यदि मैं कभी डिक्टेटर बना, तो धर्म का राजनीति के लिए इस्तेमाल पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दूंगा।“ अपने इस विश्वास की कीमत भी उन्होंने चुकाई।

विवेकानंद, जिनके चरणों के आगे बैठकर मोदी ने हाल के दौर का सबसे विद्रूप कर्मकांड किया है, वे इस मुद्दे पर और भी ज्यादा बेबाक थे। जिस भाषण के लिए उन्हें ज्यादा याद किया जाता है, 11 सितम्बर 1893 को शिकागो की धर्मसंसद में दिए अपने उस  भाषण में उन्होंने कहा था कि  “साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुंदर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज कर चुकी है। पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है। उसको बार-बार मानवता के रक्त से नहलाती रही है। सभ्यताओं को ध्वस्त करती रही है। पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही है। ये नहीं होते, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं उन्नत हो गया होता।“ 

जिनकी प्रतिमा के सामने 10 कैमरों से लाइव ध्यान लगाकर मोदी पोंगापथ को मान-प्रतिष्ठा देने और राजनीति में धर्म की सेंध लगाने की कोशिश कर रहे थे, वे विवेकानन्द ही कह गए हैं कि : “वह देश, जहां करोड़ों व्यक्ति महुआ के पौधे के फूल पर जीवित रहते हैं और जहां दस लाख से ज्यादा साधू और कोई दस करोड़ ब्राह्मण हैं, जो गरीबों का खून चूसते हैं। वह देश है या नर्क? वह धर्म है या शैतान का नृत्य?” ‘युवाओं के नाम आव्हान’ पर लिखे अपने एक खत में उन्होंने इसका इलाज भी बताया था कि : “पुरोहित–प्रपंच की बुराइयों का निराकरण करना होगा — इसलिए आगे आओ, इंसान बनो। लात मारो इन पुरोहितों को। ये हमेशा प्रगति के खिलाफ रहे हैं, ये कभी नही सुधरने वाले। इनके दिल कभी बड़े नहीं होने वाले। ये सदियों के अंधविश्वास और निरंकुश निर्दयता की औलादें हैं। सबसे पहले इस पुरोहिताई को जड़ से मिटाओ।” अच्छा होता कि मोदी भगवा धारण कर कैमरों के कोण जांचने के पहले विवेकानंद के लिखे और कहे को बांच लेते। मोदी का  और वे जिनके मोदी हैं, उनका मकसद विवेकानंद को पढ़ना नहीं, उनका मंसूबा एक फासिस्ट समाज गढ़ना है।  

भारत को एक ख़ास तरह के राष्ट्र में बदल देने का यह नापाक मंसूबा अपने आप नहीं रुकेगा। 4 जून को खुद अयोध्या ने धर्म की तिजारत करने वाले कुनबे को हराकर एक उदाहरण पेश किया है – मगर यह इन चुनाव नतीजों भर से नहीं थमेगा। यह एक राजनीतिक हथकंडा है, इसलिए इसका मुकाबला राजनीतिक मंच से तो करना ही होगा। मगर एक-दो चुनावी पराजयों के बाद भी हो सकता है कि यह सहम कर दुबक जाए, किन्तु शांत नहीं होगा। इसे निर्णायक रूप से हराने की लड़ाई दसों दिशाओं, चारों आयामों में चौबीस घंटा, सातों दिन पूरी मुस्तैदी और बिना किसी गफलत के लड़नी होगी। 

पिछले दस वर्षों में भारत को जो घाव इन्होंने दिए हैं, वे इतनी जल्दी नहीं भरेंगे। ये ज़ख्म खून के ऐसे धब्बे हैं, जिन्हें धोने के लिए जनसंघर्षों, वैचारिक मुहिमों और सामाजिक सुधार आन्दोलनों, अभियानों के मेल की दरकार होगी । ऐसा संभव है, क्योंकि इतिहास गवाह है कि भारत के इतिहास में जब-जब अँधेरे हावी हुए हैं, तब उजालों ने भी नयी-नयी राहें निकाली हैं, अपनी रोशनी और ऊष्मा के दम पर जीतें हासिल की हैं।

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