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विशेष कटाक्ष | छत्तीसगढ़ सूचना आयोग का ‘पंचवर्षीय न्याय’ : 2024 में अपील, 2028 में सुनवाई… तब तक पोते भी RTI समझ जाएंगे!

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रायपुर | विशेष व्यंग्य रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ में अगर आप सूचना का अधिकार (RTI) लगाकर सच जानने की हिम्मत कर रहे हैं, तो बेहतर होगा कि आवेदन के साथ अपना धैर्य प्रमाणपत्र, चार साल का कैलेंडर और थोड़ा जीवन बीमा भी संलग्न कर दें।
राज्य सूचना आयोग की कार्यशैली अब ऐसी हो चली है कि लोग सूचना कम, “अनंत प्रतीक्षा का अनुभव” ज्यादा लेकर लौट रहे हैं।
रायगढ़ जिले के तमनार से सामने आया कार्तिक राम पोर्ते का मामला इस व्यवस्था की सुस्त रफ्तार पर ऐसा तमाचा है, जिसकी गूंज 2028 तक सुनाई देगी।
तमनार नगर पंचायत बना, आयोग अब भी बैलगाड़ी युग में
तमनार जनपद से आगे बढ़कर अब नगर पंचायत बन चुका है। विकास के सरकारी दावे नई इमारतों में चमक रहे हैं, लेकिन सूचना आयोग की फाइलें आज भी मानो कछुए की पीठ पर रायपुर की यात्रा कर रही हैं।
29 मई 2024 को दायर की गई अपील पर आयोग ने जो तारीख दी है, वह अपने आप में “सुशासन का स्मारक” बन चुकी है।
तारीखों का महाकाव्य
अपील दाखिल: 29 मई 2024
प्रथम सुनवाई: 23 दिसंबर 2025
अगली सुनवाई / जवाब: 14 जून 2028
यानि कुल मिलाकर लगभग चार साल का तपस्या काल।
इतने समय में सरकारें बदल जाती हैं, बच्चे बोर्ड परीक्षा देकर कॉलेज पहुँच जाते हैं, और जिन अधिकारियों से जवाब मांगा गया हो, वे शायद रिटायर होकर पेंशन का आनंद भी लेने लगें।
मुख्य सूचना आयुक्त अमिताभ जैन के राज में ‘विश्राम-शासन’?
प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और वर्तमान मुख्य सूचना आयुक्त अमिताभ जैन के कार्यकाल में सूचना आयोग की यह रफ्तार लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।
जनता तंज कस रही है—
“क्या फाइलें रायगढ़ से रायपुर पैदल लाई जा रही हैं?”
या फिर आयोग ने ‘भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश’ के लिए ‘कार्य मुक्त आयोग’ का नया मॉडल अपनाया है?
व्यंग्यकारों का कहना है कि अब RTI का मतलब Right to Information नहीं, बल्कि
“Right to Insult” — अपमान का अधिकार
हो गया है।
भ्रष्टाचारियों को आयोग की ओर से ‘हनीमून पीरियड’
जब किसी भ्रष्ट अधिकारी को पता चलता है कि उसकी पेशी 1478 दिन बाद है, तो उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान आ जाती है जैसे आयोग ने उसे सबूत मिटाने, फाइल गायब करने और रिकॉर्ड रद्दी में बेचने के लिए सरकारी मोहलत दे दी हो।
चार साल की इस दूरी में—
फाइलें बदल सकती हैं
रिकॉर्ड गायब हो सकते हैं
गवाह भूल सकते हैं
और भ्रष्टाचार के निशान इतिहास बन सकते हैं
यही वजह है कि जनता पूछ रही है—
क्या ‘भ्रष्टाचार मुक्त छत्तीसगढ़’ का सपना इन्हीं लंबी तारीखों के नीचे दम तोड़ रहा है?
न्याय अंधा नहीं, कोमा में है!
यहाँ न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी नहीं बंधी है,
बल्कि लगता है वह 2028 तक लंबी छुट्टी पर चली गई हैं।
आवेदकों के लिए विशेष सलाह यही है कि अगर सूचना आयोग जाना हो तो साथ में—
एक बिस्तर
राशन का डिब्बा
चार साल का कैलेंडर
और अगली पीढ़ी का वारिस
जरूर लेकर जाएँ।
क्योंकि यहाँ 2024 की अर्जी पर 2028 में जवाब देने का चमत्कार पूरी गंभीरता से होता है।
अंतिम कटाक्ष
तमनार नगर पंचायत बन गया, कुर्सियाँ बदल गईं, अधिकारी बदल गए, लेकिन आम आदमी की किस्मत अब भी वही है—
सूचना मांगो, इंतजार पाओ।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के “सांय-सांय” सुशासन मॉडल की रफ्तार सूचना आयोग की फाइलों तक पहुँचते-पहुँचते मानो
“आएं-बाएं-शायें” हो गई है।
**जय हो छत्तीसगढ़ सूचना आयोग की—
जहाँ 2024 की अपील पर 2028 में न्याय का ‘चमत्कार’ होता है!**

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