पत्थलगांव शिक्षा विभाग में पारदर्शिता पर सवाल: RTI में 6 साल का हिसाब मांगते ही मचा हड़कंप
|
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
DEO का 3 दिन का अल्टीमेटम, विकास निधि और खरीदी रिकॉर्ड छिपाने के आरोपों से बढ़ी विभाग की मुश्किलें
जशपुर | विशेष रिपोर्ट
पत्थलगांव के शिक्षा विभाग में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक ओर सरकार भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर एक शासकीय विद्यालय में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं कराए जाने से विभाग की कार्यप्रणाली संदेह के घेरे में आ गई है।
मामला तब तूल पकड़ गया जब विद्यालय के जन सूचना अधिकारी एवं प्राचार्य द्वारा वर्ष 2018 से अब तक प्राप्त शासन राशि, विकास निधि और जनभागीदारी मद में हुए खर्चों का विस्तृत ब्यौरा देने में देरी की गई। आवेदक ने 5000 रुपये से अधिक की खरीदी से जुड़े बिल, कोटेशन, तुलनात्मक पत्रक, भुगतान दस्तावेज और ऑडिट रिपोर्ट जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां मांगी थीं।
6 साल का हिसाब देने में क्यों हो रही देरी?
सूत्रों के अनुसार, महीनों बीत जाने के बाद भी जानकारी उपलब्ध नहीं कराना कई सवालों को जन्म दे रहा है। खासकर विकास कार्यों और खरीदी प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक न करना यह संकेत देता है कि विभाग के भीतर वित्तीय अनियमितताओं या दस्तावेजी गड़बड़ियों को छिपाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
DEO की सख्त कार्रवाई, 3 दिन में सूचना देने का आदेश
मामला जब प्रथम अपीलीय अधिकारी यानी जिला शिक्षा अधिकारी (DEO), Jashpur तक पहुंचा, तो विभाग ने तत्काल संज्ञान लेते हुए कड़ा रुख अपनाया।
पत्र क्रमांक 135/2026-27 के तहत प्राचार्य को निर्देश दिया गया है कि—
03 दिवस के भीतर समस्त प्रमाणित जानकारी आवेदक को नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाए
आदेश की अवहेलना होने पर अगली सुनवाई में कड़ी दंडात्मक कार्रवाई के लिए तैयार रहें
RTI उल्लंघन पर बढ़ सकती है कानूनी मुश्किल
आवेदक पक्ष ने स्पष्ट किया है कि वे अनावश्यक रूप से विभागीय कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाएंगे। उनका कहना है कि RTI अधिनियम की धारा 7(1) के तहत निर्धारित समयसीमा का उल्लंघन हुआ है, जिसके लिए दोषी अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं में आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग भी की गई है।
“क्या विद्यालय की विकास निधि में बंदरबांट हुई है? आखिर ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करने से अधिकारी क्यों बच रहे हैं? यह सिर्फ देरी नहीं, बल्कि जवाबदेही से बचने और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने जैसा है।”
— जागरूक नागरिक मंच
17 अप्रैल की सुनवाई पर टिकी सबकी नजर
अब इस पूरे मामले में 17 अप्रैल 2026 को प्रस्तावित सुनवाई को निर्णायक माना जा रहा है। यदि तय समयसीमा में जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई, तो संबंधित अधिकारियों पर जुर्माना, विभागीय कार्रवाई और अनुशासनात्मक गाज गिरना लगभग तय माना जा रहा है।
|
Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space





