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कस्टोडियल डेथ केस में इंसाफ की बड़ी जीत: सथानकुलम मामले में 9 पुलिसकर्मियों को फांसी

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मदुरै कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, ₹1.40 करोड़ मुआवजा भी
विशेष रिपोर्ट | तमिलनाडु | थूथुकुडी/मदुरै
भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पुलिस बर्बरता के खिलाफ एक ऐतिहासिक और सख्त संदेश देते हुए मदुरै की प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत ने सथानकुलम कस्टोडियल डेथ केस में बड़ा फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने वर्ष 2020 में पुलिस हिरासत में हुई पी. जयराज और उनके बेटे जे. बेनिक्स की मौत के मामले में दोषी पाए गए सभी 9 पुलिसकर्मियों को मृत्युदंड (फांसी) की सजा सुनाई है। साथ ही अदालत ने दोषियों पर ₹1.40 करोड़ का सामूहिक जुर्माना लगाते हुए यह राशि पीड़ित परिवार को देने का निर्देश दिया। �

क्या था पूरा मामला?
यह सनसनीखेज मामला जून 2020 का है, जब कोविड लॉकडाउन के दौरान तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले के सथानकुलम में मोबाइल दुकान संचालक पी. जयराज (58) और उनके बेटे जे. बेनिक्स (31) को कथित तौर पर तय समय के बाद दुकान खुली रखने के आरोप में पुलिस ने हिरासत में लिया था।
आरोप है कि पुलिस स्टेशन के भीतर दोनों के साथ रातभर अमानवीय मारपीट और यातना दी गई। गंभीर चोटों और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण दोनों की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था और पुलिसिया अत्याचार के खिलाफ व्यापक जनआक्रोश पैदा हुआ था। �

कोर्ट ने कहा – ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’
फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश जी. मुथुकुमारन ने इसे ‘विरल से विरलतम’ (Rarest of Rare) श्रेणी का अपराध बताया।
अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि—
“जिन हाथों में जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी, उन्हीं हाथों ने कानून का सबसे क्रूर उल्लंघन किया। यह केवल हत्या नहीं, बल्कि मानवाधिकारों और पुलिस वर्दी की गरिमा पर गंभीर प्रहार है।”

जांच में क्या रहे निर्णायक सबूत?
इस हाई-प्रोफाइल केस में तीन अहम पहलुओं ने दोषियों तक न्याय पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई—
1) सीबीआई की वैज्ञानिक जांच
सीबीआई ने जांच में पुलिस द्वारा तैयार की गई एफआईआर को फर्जी पाया और साबित किया कि लॉकडाउन उल्लंघन का दावा संदिग्ध था।
2) महिला हेड कांस्टेबल की गवाही
थाने में तैनात महिला पुलिसकर्मी की प्रत्यक्षदर्शी गवाही ने अदालत में केस को मजबूत आधार दिया।
3) फोरेंसिक साक्ष्य
थाने की दीवारों और फर्श पर मिले रक्त के धब्बे पीड़ितों के डीएनए से मेल खाने पर पुलिस का बचाव कमजोर पड़ गया।

परिवार बोला – आखिरकार मिला न्याय
फैसले के बाद पीड़ित परिवार ने राहत जताते हुए कहा कि यह सिर्फ उनके परिवार की नहीं, बल्कि हर उस नागरिक की जीत है जो पुलिसिया जुल्म का शिकार होता है।
परिजनों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में हिरासत में यातना जैसे मामलों पर एक सख्त नजीर बनेगा।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों के अनुसार यह फैसला भारत में कस्टोडियल टॉर्चर के मामलों में ऐतिहासिक मिसाल साबित होगा। हालांकि दोषी पुलिसकर्मी उच्च न्यायालय में अपील कर सकते हैं, लेकिन ट्रायल कोर्ट का यह रुख कानून-व्यवस्था में जवाबदेही तय करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

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