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रुपये का ख़त, भारत के नाम “मुझे डॉलर से नहीं, लोकतंत्र की कीमत से तौलो”

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राजनैतिक व्यंग्य :  (रवीश कुमार टीवी पत्रकार एंकर)


प्रिय भारत मैं रुपया हूं।
घबराना मत, अभी ज़िंदा हूं। बस थोड़ा बुख़ार है, हल्की कंपकंपी है, और डॉलर को देखते ही घुटनों में कंपन शुरू हो जाता है। डॉक्टर कह रहे हैं कि चिंता की बात नहीं, यह “मजबूत सरकार के दौर की सामान्य कमजोरी” है।
कभी मैं भी सीना तानकर चलता था। एक डॉलर के सामने 62 पर खड़ा रहता था। आज 95 पर आकर सांस फूल रही है। लेकिन मेरी चिंता मत करो। मैं तो सदियों से गिरकर भी चलना जानता हूं। असली चिंता उस राजनीति की करो, जो हर दिन मज़बूत होती गई और मुझे हर दिन कमज़ोर करती गई।
मेरी हालत पर भाषण बहुत हुए। कहा गया कि मुझे मज़बूत किया जाएगा, दुनिया में सम्मान दिलाया जाएगा। मगर हुआ यह कि भाषण मजबूत होते गए, मैं पिचकता गया। दोष मेरा नहीं है। दोष उन हाथों का है जो डॉलर ला नहीं सके, बचा नहीं सके, और जो आया उसे भी बाहर जाने से रोक नहीं सके।
विदेशी निवेशक आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, हाथ मिलाते हैं, और मौका मिलते ही अपना पैसा समेटकर निकल जाते हैं। जाते-जाते मेरी हड्डियाँ ढीली कर जाते हैं। मैं फिर गिर जाता हूं और टीवी पर बहस शुरू हो जाती है— “रुपया क्यों गिरा?”
कोई यह नहीं पूछता— “नीतियाँ क्यों गिरीं?”
मुझे डॉलर से उतना डर नहीं लगता, जितना रात के 8 बजे से लगता है।
2016 की वह रात अब भी याद है, जब मुझे अचानक बंद कर दिया गया। कहा गया कि काला धन बाहर आएगा, भ्रष्टाचार खत्म होगा, आतंकवाद रुक जाएगा। दीवारों, गद्दों और तहखानों से कुछ खास नहीं निकला, लेकिन मैं जरूर नोटबंदी के बाद से खोया-खोया रहने लगा।
मैंने देखा— चंदे की नदियाँ एक ही दिशा में बहने लगीं। चुनाव आते गए, मैं लिफाफों में, खातों में, योजनाओं में, और कभी-कभी सीधे वोटर की हथेली तक पहुंचता गया। डॉलर के सामने मैं 92 हुआ, 95 हुआ, लेकिन चुनावी मौसम में मेरी ताकत अचानक बढ़ जाती है। तब मैं रिज़ल्ट भी निकाल देता हूं।
वित्त मंत्री मेरी फैमिली डॉक्टर हैं, और रिज़र्व बैंक के गवर्नर मेरे कार्डियोलॉजिस्ट। जैसे ही मेरी धड़कन तेज होती है, वे बाज़ार में डॉलर छोड़ देते हैं— जैसे ICU में ऑक्सीजन लगाई जाती है। मैं फिर कुछ देर के लिए संभल जाता हूं, मगर बीमारी जड़ में ही बनी रहती है।
इस चुनाव में भी मैं हजारों करोड़ की शक्ल में घूमूंगा। बस तरीका बदलेगा— नाम होगा योजना, लाभ, सहायता, सम्मान, प्रोत्साहन। मैं बांटा जाऊंगा, मुस्कानें बटोरूंगा, और फिर वोट में बदल जाऊंगा।
इसलिए मुझे हमेशा डॉलर के मुकाबले मत देखो।
अगर सच में मेरी कीमत समझनी है, तो मुझे चुनाव आयोग के मुकाबले देखो, लाभार्थी योजनाओं के मुकाबले देखो, वोटर की मजबूरी के मुकाबले देखो।
कमज़ोर मैं नहीं हुआ हूं,
कमज़ोर वह नागरिक हुआ है जो मुझे पाकर अपने भविष्य का सौदा कर देता है।
मैं तो फिर भी चल जाऊंगा—
जेब से बैंक, बैंक से बाज़ार, बाज़ार से सत्ता तक।
तुम अपनी चिंता करो, क्योंकि अगर लोकतंत्र की कीमत गिर गई, तो मुझे संभालने वाला कोई नहीं बचेगा।
तुम्हारा,
रुपया

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