लैलूंगा जनपद में शिविर के नाम पर पंचायतों से वसूली के आरोप, कमीशनखोरी पर उठे गंभीर सवाल
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जनसमस्या निवारण शिविर के आयोजन खर्च को लेकर ग्राम पंचायतों में नाराजगी, फाइलों के निपटारे में अनौपचारिक भुगतान की चर्चा तेज
लैलूंगा। लैलूंगा जनपद पंचायत में हाल ही में आयोजित जनसमस्या निवारण शिविर अब विवादों में घिरता नजर आ रहा है। ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय ग्रामीणों के बीच यह चर्चा तेज है कि शिविर आयोजन के नाम पर पंचायतों से कथित रूप से राशि एकत्र की गई। आरोप है कि पहले से सीमित पंचायत बजट पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डालते हुए यह राशि ली गई, जबकि आम जनता की समस्याओं के समाधान को लेकर अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आए।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, जनपद कार्यालय में विभिन्न प्रशासनिक कार्यों के निष्पादन को लेकर कथित कमीशनखोरी और अनौपचारिक भुगतान की चर्चाएं लंबे समय से चल रही हैं। पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि कई बार फाइलों के निराकरण में अनावश्यक विलंब होता है और अप्रत्यक्ष रूप से “सुविधा शुल्क” की अपेक्षा की जाती है, जिससे विकास कार्य प्रभावित होते हैं।
शिविर खर्च पर उठे बड़े सवाल
ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों ने सवाल उठाया है कि यदि जनसमस्या निवारण शिविर शासन-प्रशासन का आधिकारिक कार्यक्रम था, तो इसके आयोजन व्यय के लिए पंचायतों से योगदान लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी। उनका कहना है कि पंचायतों को मिलने वाली राशि पहले ही विकास कार्यों, सड़क, भवन, पेयजल और अन्य मूलभूत योजनाओं में खर्च होती है, ऐसे में इस प्रकार की कथित वसूली ग्रामीण विकास को प्रभावित कर सकती है।
कार्यालयीन कार्यप्रणाली पर असंतोष
पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों का आरोप है कि जनपद कार्यालय में कई कार्य बिना अनौपचारिक भुगतान के समय पर आगे नहीं बढ़ते। फाइलों की प्रक्रिया में देरी और कर्मचारियों की कार्यशैली को लेकर भी असंतोष सामने आया है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है, लेकिन बढ़ती नाराजगी ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग
ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों ने जिला प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि शिविर के नाम पर पंचायतों से राशि ली गई है, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जनसमस्या निवारण शिविर वास्तव में जनता की समस्याओं के समाधान के लिए था, या फिर पंचायतों पर अतिरिक्त आर्थिक भार डालने का एक माध्यम बन गया?
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