हास्य-व्यंग्य कविता: बिहार की राजनीति – फेल नेताओं का पास खेल
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बिहार की राजनीति बड़ी निराली,
सुबह में दुश्मन, शाम में घरवाली। 😄
कोई 7वीं फेल, कोई 9वीं फेल,
फिर भी कुर्सी पाने में सब अव्वल खेल। 😂
किताबों से दूर, भाषण में तेज,
जनता को दिखाएं विकास का पेज।
एक बोले — “हमसे बड़ा विद्वान कौन?”
दूजा बोले — “हम हैं जनता के फोन।”
जनता हंसकर बोली धीरे,
“पहले हिसाब सीखो, फिर बनो महान।” 😆
यहाँ गठबंधन का बड़ा कमाल,

कल तक विरोधी, आज गले में माल।
सुबह कमल, शाम लालटेन,
रात होते ही बदल गया खेल। 🌸🏮😂
सड़क की बात हुई दस साल,
फिर भी गड्ढों का वही हाल।
नेता जी बोले — “विकास हुआ,”
जनता बोली — “हाँ, गड्ढा हुआ विशाल।” 😄
स्कूल में बच्चे ढूंढें मास्टर,
नेता जी मंच पे बनें डिसास्टर।
7वीं फेल बोले शिक्षा सुधार,
9वीं फेल दे ज्ञान अपार। 😅
भाषण ऐसा लंबा चले,
घड़ी की सूई भी थक के ढले।
किसान, मजदूर सब ऊंघने लगे,
नेता जी फिर भी जोश में जले। 😂
कुर्सी दिखते ही बदलें विचार,
जैसे सावन में बदलता बहार।
जनता पूछे — “वादे कहाँ?”
नेता बोले — “पहले अगला चुनाव यार।” 😆
एक बोले — “हम गरीबों के साथ,”
दूजा बोले — “हम विकास के नाथ।”
जनता बोली — “दोनों ठीक,
बस सड़क बनवा दो गांव की राह।” 😄
7वीं फेल बोले — “हम शेर बिहार,”
9वीं फेल बोले — “हम सरकार।”
जनता हंसकर बोली प्यारे,
“काम बिना सब बेकार।” 😂
चुनाव आते ही वादों की रेल,
हर गली में भाषण का मेल।
जनता बोली — “इस बार ध्यान,
काम करे वही पास, बाकी सब फेल।” 😆👏
अंत में यही जनता की पुकार,
“बात नहीं, चाहिए काम इस बार।”
बिहार की राजनीति का यही खेल,
फेल पढ़ाई में, कुर्सी में फर्स्ट क्लास मेल। 😄🎤
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